पर्दे पर उनकी आवाज़ ऊंची होती थी तो सिनेमाघर में सन्नाटा छा जाता था। ‘क्रांतिवीर’ का प्रताप कटघरे में खड़े समाज को आईना दिखाता था, ‘परिंदा’ का अन्ना सेठ अपनी ठंडी मुस्कान से डराता था। फिर वही अभिनेता ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी बनकर आया और खुद को “कंट्रोल, उदय… कंट्रोल!” कहकर समझाता रहा, तो पूरा देश हंसते-हंसते लोटपोट हो गया। गुस्सा और हंसी, दोनों को एक जैसी सच्चाई से निभा पाने वाले कलाकार कम होते हैं। नाना पाटेकर उनमें से एक थे।
8 अक्टूबर 2026 की सुबह यह खबर आई कि नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं रहे। वे 75 वर्ष के थे। यह लेख सिर्फ़ उनके जाने की खबर नहीं है। यह उस आदमी की कहानी है जिसने 13 साल की उम्र में कमाना शुरू किया, थिएटर में खुद को गढ़ा और करीब पांच दशक तक हिंदी और मराठी सिनेमा में अपनी शर्तों पर काम किया।
नाना पाटेकर का निधन: अब तक क्या पुष्ट है
बिज़नेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, गुरुवार 8 अक्टूबर की तड़के नाना पाटेकर गोवा के डोना पाउला स्थित अपने घर पर अचेत अवस्था में मिले। उन्हें मणिपाल हॉस्पिटल, गोवा ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने लगभग 45 मिनट तक उन्हें होश में लाने की कोशिश की।
समाचार एजेंसी ANI की रिपोर्ट में अस्पताल के हवाले से मौत की वजह कार्डियक अरेस्ट बताई गई है। उसी रिपोर्ट के मुताबिक, पार्थिव शरीर को पोस्टमार्टम के लिए गोवा मेडिकल कॉलेज ले जाया गया। इसलिए फिलहाल कार्डियक अरेस्ट को रिपोर्ट किया गया कारण माना जाना चाहिए; अंतिम मेडिकल निष्कर्ष पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ही साफ़ होगा।
उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने निधन की पुष्टि की। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की घोषणा की। मराठी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उनकी इच्छा के मुताबिक अंतिम संस्कार पुणे ज़िले के डोणजे गांव स्थित उनके खेत पर किया जाना है।
नाना पाटेकर: एक नज़र में
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| असली नाम | विश्वनाथ गजानन पाटेकर |
| जन्म | 1 जनवरी 1951, मुरुड-जंजीरा (रायगढ़), महाराष्ट्र |
| निधन | 8 अक्टूबर 2026, गोवा (आयु 75 वर्ष) |
| शिक्षा | सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ़ अप्लाइड आर्ट, मुंबई |
| पहली फ़िल्म | गमन (1978) |
| निर्देशन | प्रहार: द फ़ाइनल अटैक (1991) |
| राष्ट्रीय पुरस्कार | 3 (परिंदा, क्रांतिवीर, अग्नि साक्षी) |
| नागरिक सम्मान | पद्म श्री (2013) |
| सामाजिक कार्य | नाम फ़ाउंडेशन के सह-संस्थापक (2015) |
35 रुपये की नौकरी और एक वक्त का खाना: बचपन का संघर्ष
नाना का जन्म महाराष्ट्र के तटीय कस्बे मुरुड-जंजीरा में हुआ था। पिता को नाटकों का शौक था और वही बेटे को नाटक दिखाने ले जाते थे। लेकिन परिवार की आर्थिक हालत बिगड़ी तो बचपन जल्दी पीछे छूट गया।
अलग-अलग इंटरव्यू में नाना ने खुद बताया कि उन्होंने 13 साल की उम्र में काम शुरू कर दिया था। ओपन मैगज़ीन के श्रद्धांजलि लेख में उनके पुराने इंटरव्यू के हवाले से दर्ज है कि उस दौर में उन्हें महीने के 35 रुपये और दिन में एक वक्त का खाना मिलता था। एक बातचीत पर आधारित नवभारत लाइव की रिपोर्ट के अनुसार, उन दिनों उन्हें काम के लिए रोज़ करीब 16 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।
दिसंबर 2024 के एक इंटरव्यू में उन्होंने इसे एक वाक्य में समेटा था कि 13 साल में काम शुरू करने की वजह से वे “बहुत जल्दी 30 के हो गए”। भूख की याद उनके साथ उम्र भर रही। एक पुरानी बातचीत में उन्होंने कहा था कि रोटी की खुशबू से बेहतर कोई खुशबू नहीं होती।
शुरुआती कमाई का बड़ा ज़रिया उनकी पेंटिंग थी। वे फ़िल्मों के पोस्टर बनाने का काम करते थे और बाद में कमर्शियल आर्टिस्ट और विज़ुअलाइज़र के तौर पर भी काम किया। इसी हुनर ने उन्हें मुंबई के सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ़ अप्लाइड आर्ट तक पहुंचाया।
इस संघर्ष ने उनके स्वभाव को गढ़ा। पैसे को लेकर उनकी बेपरवाही, दिखावे से दूरी और आत्मसम्मान पर ज़िद, सबकी जड़ें इन्हीं सालों में दिखती हैं।
रंगमंच से कैमरे तक का सफ़र
पेंटिंग के साथ-साथ नाना मराठी रंगमंच से जुड़ गए। उन्होंने मशहूर रंगकर्मी विजया मेहता को अपने अभिनय को आकार देने का श्रेय दिया। मराठी नाटक ‘पुरुष’ जैसे मंचन ने उन्हें एक ऐसे अभिनेता के रूप में पहचान दी जो किरदार की हिंसा और कमज़ोरी, दोनों को ईमानदारी से दिखा सकता था।
फ़िल्मों की ओर धकेलने में स्मिता पाटिल की बड़ी भूमिका रही। 2015 में पत्रकारों से बातचीत में नाना ने कहा था कि स्मिता ने उन्हें फ़िल्मों में आने के लिए “मजबूर” किया। उन्होंने यह भी बताया था कि स्मिता ने रवि चोपड़ा की फ़िल्म ‘आज की आवाज़’ के लिए उनके नाम की सिफ़ारिश की थी।
शुरुआती फ़िल्में और ‘परिंदा’ से मिली पहचान
नाना ने 1978 में मुज़फ़्फ़र अली की ‘गमन’ से फ़िल्मी सफ़र शुरू किया। अगले कुछ साल छोटे और अलग तरह के किरदारों में बीते। 1986 में एन. चंद्रा की ‘अंकुश’ आई, जिसमें बेरोज़गार और नाराज़ युवाओं की कहानी ने उन्हें दर्शकों के बीच पहचान दिलाई।
1988 में मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे!’ में उन्होंने बाबा का किरदार निभाया। यह फ़िल्म ऑस्कर में विदेशी भाषा श्रेणी के लिए नामांकित हुई और नाना को अंतरराष्ट्रीय नज़र मिली।
असली मोड़ 1989 में विधु विनोद चोपड़ा की ‘परिंदा’ से आया। अन्ना सेठ के रूप में उन्होंने ऐसा खलनायक रचा जो चिल्लाता नहीं था, फिर भी डराता था। इस भूमिका के लिए उन्हें 37वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (समारोह 1990) में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला।
नब्बे का दशक: जब नाना ने पर्दे पर राज किया
1991 में नाना ने ‘प्रहार: द फ़ाइनल अटैक’ लिखी और निर्देशित की। इसमें उन्होंने मेजर चौहान की भूमिका निभाई। एक सख़्त सैन्य अफ़सर की यह कहानी उनके अनुशासन-प्रिय व्यक्तित्व का विस्तार लगती थी।
1992 की ‘अंगार’ में माजिद ख़ान के किरदार के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार मिला। 1993 की ‘तिरंगा’ में राज कुमार के साथ इंस्पेक्टर शिवाजीराव वागले के रूप में उनकी जोड़ी आज भी याद की जाती है। इस फ़िल्म में चंकी पांडे भी थे, जिनके फ़िल्मी सफ़र पर हमारा यह लेख पढ़ा जा सकता है।
1994 की ‘क्रांतिवीर’ उनके करियर का शिखर बनी। प्रताप नारायण तिलक के किरदार के लिए उन्हें 42वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (समारोह 1995) में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला, साथ ही फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट एक्टर भी।
1996 में दो बिल्कुल अलग फ़िल्में आईं। ‘अग्नि साक्षी’ में शक्की और हिंसक पति विश्वनाथ के लिए उन्हें तीसरा राष्ट्रीय पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता, समारोह 1997) मिला। वहीं संजय लीला भंसाली की ‘ख़ामोशी: द म्यूज़िकल’ में मूक-बधिर पिता जोसेफ़ ब्रिगेंज़ा बनकर उन्होंने दिखाया कि बिना संवाद के भी वे उतने ही असरदार हैं। 1997 की ‘यशवंत’ में एक ईमानदार और गुस्सैल पुलिसवाले का किरदार उनकी छवि का पर्याय बन गया।
पर्दे के पीछे के 7 किस्से, जो नाना को समझाते हैं
1. ‘परिंदा’ की आग: “असली आग थी”
‘परिंदा’ के क्लाइमैक्स में आग का दृश्य था। द लल्लनटॉप को दिए इंटरव्यू में नाना ने याद किया कि दूसरे टेक में आग पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ थी और कुछ ही सेकंड में उन तक पहुंच गई। उनके मुताबिक, उनकी दाढ़ी, मूंछें, भौंहें और पलकें तक जल गईं। वे 60 दिन अस्पताल में रहे और लगभग एक साल काम नहीं कर पाए। नाना ने यह भी साफ़ किया था कि यह एक हादसा था; निर्देशक का इरादा उन्हें नुकसान पहुंचाने का नहीं था।
2. ‘सलाम बॉम्बे!’ में लगी असली चोट
उसी बातचीत में नाना ने ‘सलाम बॉम्बे!’ का एक किस्सा सुनाया। एक दृश्य में एक लड़के को उन पर चाकू से वार करना था। सुरक्षा के लिए कमर पर टायर बांधा गया था, फिर भी चाकू लग गया और ख़ून बहने लगा। नाना के अनुसार, सेट पर लोगों को लगा कि वे शानदार अभिनय कर रहे हैं।
3. अस्पताल से सीधे ‘क्रांतिवीर’ का क्लाइमैक्स
आज तक की रिपोर्ट के अनुसार, द लल्लनटॉप से बातचीत में नाना ने बताया कि क्लाइमैक्स से पहले सीने में दर्द के कारण वे अस्पताल में भर्ती थे। निर्देशक मेहुल कुमार ने शूटिंग टालने को कहा, लेकिन नाना डॉक्टर के साथ सेट पर पहुंचे। उनके अनुसार, जिस हिस्से के लिए 6-7 दिन रखे गए थे, वह करीब ढाई घंटे में पूरा हो गया। मशहूर मोनोलॉग का बड़ा हिस्सा उन्होंने वहीं गढ़ा था, और बाद में कहा कि उन्हें उसकी पंक्तियां याद नहीं।
4. ‘परिंदा’ के अवॉर्ड पर मां की नाराज़गी
राष्ट्रीय पुरस्कार की खुशी घर में वैसी नहीं थी जैसी कोई सोचेगा। 2024 के एक इंटरव्यू में नाना ने बताया कि उनकी मां ने डांटते हुए कहा था कि उन्हें यह भी नहीं पता कि अवॉर्ड किसे दिया जाता है। मां के लिए इतना बुरा किरदार निभाने पर सम्मान मिलना समझ से परे था।
5. ‘वेलकम’: “मां की कसम खाओ”
निर्देशक अनीस बज़्मी ने एक टीवी शो पर याद किया कि नाना पहले कहानी सुनना ही नहीं चाहते थे। IANS की रिपोर्ट के अनुसार, नाना ने कहा कि बस मां की कसम खाकर बता दो कि फ़िल्म मेरे लिए अच्छी है। बज़्मी ने तीन घंटे में कहानी सुनाई। उसके बाद नाना ने उन्हें गले लगाया और कहा कि वे “कच्ची मिट्टी” की तरह सेट पर आएंगे।
6. ‘प्रहार’ और सेना से रिश्ता
‘प्रहार’ की तैयारी में नाना ने सेना के साथ प्रशिक्षण लिया। वे टेरिटोरियल आर्मी से जुड़े और उन्हें मानद रैंक मिली। रिपोर्टों के अनुसार, 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान वे कुछ समय सेना के साथ रहे। इसे सक्रिय युद्ध-भूमिका के तौर पर नहीं, बल्कि सेना से उनके गहरे भावनात्मक जुड़ाव के रूप में देखा जाना चाहिए।
7. अभिनय का उनका फ़लसफ़ा
नाना का मानना था कि कॉमेडी “सीधे चेहरे” के साथ की जानी चाहिए। यही बात उनके हर काम में दिखी: वे किरदार को कभी ‘सजाते’ नहीं थे। अनीस बज़्मी ने भी एक इंटरव्यू में कहा था कि नाना गुस्सैल ज़रूर हैं, पर बेहद ईमानदार हैं और मन की बात कह देते हैं। सेट पर उनकी सख़्ती की चर्चा अक्सर होती थी, लेकिन उसके केंद्र में काम के प्रति लगभग ज़िद भरा समर्पण था।
नाना पाटेकर की वो फिल्में जिन्हें दर्शक कभी नहीं भूल पाएंगे
अंकुश (1986)
बेरोज़गार युवाओं के गुस्से की कहानी में रवि का किरदार। सिस्टम से टकराते आम आदमी की वह छवि यहीं से बनी जो आगे ‘क्रांतिवीर’ तक गई।
सलाम बॉम्बे! (1988)
किरदार: बाबा। मीरा नायर की यह फ़िल्म मुंबई की सड़कों का कड़वा सच दिखाती है। नाना यहां उस व्यवस्था का चेहरा हैं जो बच्चों का बचपन निगल जाती है।
परिंदा (1989)
किरदार: अन्ना सेठ। हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार खलनायकों में से एक। धीमी आवाज़ और बेचैन आंखें इस किरदार की सबसे बड़ी ताकत थीं।
प्रहार: द फ़ाइनल अटैक (1991)
किरदार: मेजर चौहान। लेखक, निर्देशक और अभिनेता के रूप में नाना का सबसे निजी काम। व्यवस्था की सड़न पर एक फ़ौजी की नज़र।
तिरंगा (1993)
किरदार: इंस्पेक्टर शिवाजीराव वागले। राज कुमार के अंदाज़ के सामने नाना का कच्चा, गुस्सैल अभिनय एक दिलचस्प टकराव पैदा करता है।
क्रांतिवीर (1994)
किरदार: प्रताप नारायण तिलक। राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाने वाला यह किरदार उनकी पहचान बन गया। क्लाइमैक्स का मोनोलॉग आज भी सोशल मीडिया पर घूमता है।
अग्नि साक्षी (1996)
किरदार: विश्वनाथ। शक और नियंत्रण से भरे पति का डरावना चित्रण, जो बिना ज़्यादा शोर किए असहज कर देता है।
ख़ामोशी: द म्यूज़िकल (1996)
किरदार: जोसेफ़ ब्रिगेंज़ा। एक मूक-बधिर पिता की भूमिका, जिसमें नाना की आंखें और हाथ ही संवाद बन जाते हैं।
यशवंत (1997)
किरदार: इंस्पेक्टर यशवंत लोहार। ईमानदार, अकेला और सिस्टम से नाराज़ पुलिसवाला। इस फ़िल्म के तीखे संवाद लंबे समय तक चर्चा में रहे।
अब तक छप्पन (2004)
किरदार: इंस्पेक्टर साधु आगाशे। मुंबई पुलिस के एनकाउंटर दौर से प्रेरित इस फ़िल्म में नाना ने हिंसा को बेहद शांत चेहरे से निभाया। इसे उनके सबसे सधे हुए कामों में गिना जाता है।
अपहरण (2005)
किरदार: तबरेज़ आलम। प्रकाश झा की इस फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार मिला। राजनीति और अपराध के गठजोड़ का चालाक चेहरा।
वेलकम (2007)
किरदार: उदय शेट्टी। एक डॉन जो बार-बार अपने गुस्से पर काबू पाने की कोशिश करता है। नाना की कॉमिक टाइमिंग का सबसे बड़ा प्रमाण।
राजनीति (2010)
किरदार: बृज गोपाल। प्रकाश झा की राजनीतिक गाथा में पर्दे के पीछे चालें चलने वाला अनुभवी चेहरा।
नटसम्राट (2016)
किरदार: गणपतराव ‘अप्पा’ बेलवलकर। मराठी सिनेमा में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक। एक बूढ़े अभिनेता का अपने ही घर में बेगाना हो जाना, बेहद मार्मिक ढंग से।
वनवास (2024)
किरदार: दीपक त्यागी। डिमेंशिया से जूझते पिता, जिन्हें उनके बेटे बनारस में छोड़ आते हैं। उम्र के आख़िरी दौर में भी वे भावनात्मक भूमिकाओं में उतने ही सहज थे।
पुराने दौर की और यादगार फ़िल्में खोज रहे हैं तो हमारी बेहतरीन IMDb रेटिंग वाली बॉलीवुड फ़िल्मों की सूची भी देख सकते हैं।
चुनिंदा फ़िल्मोग्राफ़ी
| फ़िल्म | वर्ष | शैली | किरदार |
|---|---|---|---|
| गमन | 1978 | ड्रामा | वासु |
| अंकुश | 1986 | ड्रामा | रवि |
| सलाम बॉम्बे! | 1988 | ड्रामा | बाबा |
| परिंदा | 1989 | क्राइम | अन्ना सेठ |
| प्रहार | 1991 | एक्शन-ड्रामा | मेजर चौहान |
| अंगार | 1992 | क्राइम | माजिद ख़ान |
| तिरंगा | 1993 | एक्शन | शिवाजीराव वागले |
| क्रांतिवीर | 1994 | ड्रामा | प्रताप नारायण तिलक |
| अग्नि साक्षी | 1996 | थ्रिलर | विश्वनाथ |
| ख़ामोशी | 1996 | म्यूज़िकल ड्रामा | जोसेफ़ ब्रिगेंज़ा |
| यशवंत | 1997 | एक्शन-ड्रामा | यशवंत लोहार |
| अब तक छप्पन | 2004 | क्राइम | साधु आगाशे |
| अपहरण | 2005 | पॉलिटिकल थ्रिलर | तबरेज़ आलम |
| वेलकम | 2007 | कॉमेडी | उदय शेट्टी |
| राजनीति | 2010 | पॉलिटिकल ड्रामा | बृज गोपाल |
| डॉ. प्रकाश बाबा आमटे | 2014 | बायोपिक (मराठी) | डॉ. प्रकाश आमटे |
| वेलकम बैक | 2015 | कॉमेडी | उदय शेट्टी |
| नटसम्राट | 2016 | ड्रामा (मराठी) | गणपतराव बेलवलकर |
| द वैक्सीन वॉर | 2023 | ड्रामा | डॉ. बलराम भार्गव |
| वनवास | 2024 | फ़ैमिली ड्रामा | दीपक त्यागी |
यादगार किरदार और संवाद: क्यों आज भी याद हैं
‘क्रांतिवीर’ का क्लाइमैक्स “आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने” से शुरू होता है। यह एक व्यक्ति की नहीं, तमाशबीन समाज की आलोचना थी। यही वजह है कि तीन दशक बाद भी यह दृश्य हर बहस में लौट आता है।
‘तिरंगा’ और ‘यशवंत’ में नाना वह पुलिसवाला बने जो नियमों से ज़्यादा इंसाफ़ में यक़ीन रखता है। ‘यशवंत’ के कुछ संवाद अपनी तीखी भाषा के लिए मशहूर हुए, लेकिन उनकी असली ताकत भ्रष्ट व्यवस्था पर किया गया व्यंग्य था।
‘अब तक छप्पन’ में इसके उलट था। साधु आगाशे कम बोलता है, और यही चुप्पी उसे डरावना बनाती है। यह फ़िल्म बताती है कि नाना की ताकत सिर्फ़ ऊंची आवाज़ में नहीं थी।
‘नटसम्राट’ का सबसे मार्मिक पल वह है जब अप्पा पूछते हैं, “कुणी घर देता का घर?” (कोई घर देगा क्या?)। यह सवाल बुढ़ापे की बेबसी का प्रतीक बन गया।
कॉमेडी का नया अवतार: उदय शेट्टी और ‘वेलकम’
2007 में जब ‘वेलकम’ आई, तब बहुत लोगों के लिए नाना ‘गंभीर’ अभिनेता थे। अनीस बज़्मी ने उन्हें एक ऐसे डॉन के रूप में पेश किया जो खतरनाक है, लेकिन अपनी बहन की शादी को लेकर बेहद भावुक है।
नाना ने उदय शेट्टी को कभी ‘जोकर’ नहीं बनाया। वे पूरी गंभीरता से बोलते थे और हास्य खुद-ब-खुद पैदा होता था। “कंट्रोल, उदय… कंट्रोल!” जैसी पंक्ति इसलिए मज़ेदार लगी क्योंकि उसे कहने वाला सचमुच खुद को रोकने की कोशिश करता दिखता था। अनिल कपूर के मजनू भाई के साथ उनकी जोड़ी आज भी मीम्स में ज़िंदा है। 2015 में ‘वेलकम बैक’ में वे फिर उदय शेट्टी बने, और 2025 की ‘हाउसफ़ुल 5’ में भी उनकी कॉमिक मौजूदगी की तारीफ़ हुई।
‘नटसम्राट’ और मराठी सिनेमा में योगदान
हिंदी सिनेमा में शोहरत के बावजूद नाना की जड़ें मराठी रंगमंच और सिनेमा में रहीं। 2014 में ‘डॉ. प्रकाश बाबा आमटे – द रियल हीरो’ में उन्होंने आदिवासी इलाक़ों में सेवा करने वाले डॉक्टर प्रकाश आमटे की भूमिका निभाई। इसके लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर मराठी का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला।
1 जनवरी 2016 को रिलीज़ हुई महेश मांजरेकर की ‘नटसम्राट’ कुसुमाग्रज के प्रसिद्ध नाटक पर आधारित थी। एक रिटायर्ड रंगकर्मी, जो जीवन भर दूसरों के किरदार जीता रहा और बुढ़ापे में अपने ही परिवार में जगह खोजता रहा। इस भूमिका ने उन्हें फ़िल्मफ़ेयर मराठी का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार दिलाया। 2018 की मराठी फ़िल्म ‘आपला माणूस’ में भी उनके अभिनय को सराहा गया।
प्रमुख पुरस्कार और सम्मान
| सम्मान | फ़िल्म / क्षेत्र | श्रेणी | वर्ष |
|---|---|---|---|
| राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (37वां) | परिंदा (1989) | सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता | समारोह 1990 |
| राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (42वां) | क्रांतिवीर (1994) | सर्वश्रेष्ठ अभिनेता | समारोह 1995 |
| राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (44वां) | अग्नि साक्षी (1996) | सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता | समारोह 1997 |
| फ़िल्मफ़ेयर | परिंदा | सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता | — |
| फ़िल्मफ़ेयर | अंगार | सर्वश्रेष्ठ खलनायक | — |
| फ़िल्मफ़ेयर | क्रांतिवीर | सर्वश्रेष्ठ अभिनेता | — |
| फ़िल्मफ़ेयर | अपहरण | सर्वश्रेष्ठ खलनायक | — |
| फ़िल्मफ़ेयर मराठी | डॉ. प्रकाश बाबा आमटे, नटसम्राट | सर्वश्रेष्ठ अभिनेता | — |
| पद्म श्री | कला, महाराष्ट्र | नागरिक सम्मान | 2013 |
पद्म श्री की पुष्टि भारत सरकार की पद्म पुरस्कार 2013 की आधिकारिक अधिसूचना से होती है, जिसमें उनका नाम “श्री नाना गजानन पाटेकर, कला, महाराष्ट्र” के रूप में दर्ज है। तीनों राष्ट्रीय पुरस्कारों की श्रेणियां ध्यान देने लायक हैं: एक सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और दो सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के।
पर्दे से परे: खेत, किसान और ‘नाम फ़ाउंडेशन’
नाना की निजी ज़िंदगी उनकी स्टार-छवि से बिल्कुल अलग थी। पुणे के पास उनका फ़ार्महाउस और खेती से उनका लगाव जगजाहिर था। वे अक्सर सादे कपड़ों में, बिना तामझाम के दिखते थे।
2015 में महाराष्ट्र सूखे और किसान आत्महत्याओं के संकट से जूझ रहा था। उसी साल सितंबर में नाना और अभिनेता मकरंद अनासपुरे ने नाम फ़ाउंडेशन की शुरुआत की। संस्था की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, इसका काम किसान परिवारों की मदद, नदी पुनर्जीवन, गाद निकालना, खेत-तालाब बनाना, शिक्षा, स्वास्थ्य और शहीद सैनिकों के परिवारों की सहायता जैसे क्षेत्रों में फैला है।
शुरुआत में संस्था ने संकट में फंसे किसान परिवारों को सीधी आर्थिक मदद दी। बाद में ध्यान जल-संरक्षण जैसे दीर्घकालिक कामों पर गया। किसानों के मुद्दों पर वे सार्वजनिक मंचों से भी लगातार बोलते रहे।
विवाद, जिसका ज़िक्र ज़रूरी है
2018 में अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने 2008 की एक फ़िल्म शूटिंग के दौरान दुर्व्यवहार के आरोप लगाए। नाना ने इन आरोपों से लगातार इनकार किया। 2019 में पुलिस ने क्लोज़र (बी-समरी) रिपोर्ट दाखिल की। मार्च 2025 में मुंबई की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने 2008 की घटना से जुड़े आरोप को समय-सीमा से बाहर मानते हुए संज्ञान लेने से इनकार किया और साफ़ किया कि उसने आरोपों के तथ्यों पर कोई फ़ैसला नहीं दिया।
आख़िरी वर्षों का काम
उम्र बढ़ने के साथ नाना ने चुनिंदा काम किया। 2018 में रजनीकांत की तमिल फ़िल्म ‘काला’ में वे खलनायक हरि दादा बने। 2023 की ‘द वैक्सीन वॉर’ में उन्होंने ICMR के तत्कालीन महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव की भूमिका निभाई; फ़िल्म भले बॉक्स ऑफ़िस पर नहीं चली, पर उनके अभिनय को सराहा गया।
2024 में अनिल शर्मा की ‘वनवास’ और 2025 में ‘हाउसफ़ुल 5’ आई। फ़रवरी 2026 में रिलीज़ हुई विशाल भारद्वाज की ‘ओ’रोमियो’ में वे खुफ़िया अफ़सर इस्माइल ख़ान बने। इन पड़ावों से साफ़ है कि वे अंत तक सक्रिय थे और सिनेमा के बदलते दौर में भी अपनी जगह बनाए हुए थे।
कलाकार और प्रशंसक उन्हें कैसे याद कर रहे हैं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने X पर लिखा कि बहुत कम अभिनेताओं में नाना जैसी तीव्रता, व्यक्तित्व और अनोखी मौजूदगी थी। इंडिया मोबाइल कांग्रेस में अपने भाषण में उन्होंने कहा कि नाना “परिंदे की तरह फ़िल्मों के आसमान में उड़े” और उनकी “खामोशी भी उतनी ही प्रभावी थी।”
आज तक की रिपोर्ट के अनुसार, ‘वेलकम’ में उनके साथ काम कर चुके अक्षय कुमार ने लिखा कि उन्हें यक़ीन नहीं हो रहा कि नाना अब नहीं रहे। रितेश देशमुख ने लिखा कि आज उनके पास शब्द नहीं हैं। मनीषा कोइराला और कई अन्य हस्तियों ने भी शोक जताया।
सोशल मीडिया पर प्रशंसक ‘क्रांतिवीर’ के मोनोलॉग से लेकर उदय शेट्टी के दृश्यों तक साझा कर रहे हैं। एक ही अभिनेता के लिए एक साथ आंसू और मुस्कान, शायद यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
अलविदा, नाना
नाना पाटेकर ने कभी खुद को ‘स्टार’ की तरह पेश नहीं किया। वे पोस्टर रंगने वाले उस लड़के को कभी नहीं भूले, जो 35 रुपये के लिए रोज़ मीलों चलता था। शायद इसलिए उनके किरदारों में आम आदमी का गुस्सा इतना सच्चा लगता था, और उनकी कॉमेडी में इतनी मासूमियत।
उन्होंने पर्दे पर व्यवस्था से सवाल पूछे, खेतों में किसानों के साथ खड़े हुए और अपने आत्मसम्मान से कभी समझौता नहीं किया। परिंदा अब उड़ गया है। लेकिन जब भी कोई अभिनेता बिना शोर किए पूरा दृश्य अपने नाम कर लेगा, लोग कहेंगे, यह नाना वाली बात है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
नाना पाटेकर का निधन कब और कहां हुआ?
नाना पाटेकर का निधन 8 अक्टूबर 2026 की सुबह गोवा में हुआ। उन्हें डोना पाउला स्थित घर से मणिपाल हॉस्पिटल ले जाया गया था। वे 75 वर्ष के थे।
नाना पाटेकर की मौत की वजह क्या बताई गई है?
रिपोर्टों में अस्पताल के हवाले से कार्डियक अरेस्ट को कारण बताया गया है। पोस्टमार्टम गोवा मेडिकल कॉलेज में कराया गया; अंतिम मेडिकल निष्कर्ष उसी रिपोर्ट से तय होगा।
नाना पाटेकर का असली नाम क्या था?
उनका असली नाम विश्वनाथ गजानन पाटेकर था। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में हुआ था।
नाना पाटेकर को कितने राष्ट्रीय पुरस्कार मिले?
तीन: ‘परिंदा’ और ‘अग्नि साक्षी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता, और ‘क्रांतिवीर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता। 2013 में उन्हें पद्म श्री भी मिला।
नाना पाटेकर की पहली फ़िल्म कौन-सी थी?
उनकी पहली फ़िल्म मुज़फ़्फ़र अली की ‘गमन’ (1978) थी।
नाना पाटेकर ने कौन-सी फ़िल्म निर्देशित की थी?
उन्होंने 1991 की ‘प्रहार: द फ़ाइनल अटैक’ लिखी और निर्देशित की, जिसमें उन्होंने मेजर चौहान की भूमिका भी निभाई।
नाम फ़ाउंडेशन क्या है?
नाम फ़ाउंडेशन की शुरुआत सितंबर 2015 में नाना पाटेकर और मकरंद अनासपुरे ने की थी। यह महाराष्ट्र में किसान कल्याण और जल-संरक्षण पर काम करती है।
‘कंट्रोल उदय, कंट्रोल’ डायलॉग किस फ़िल्म का है?
यह 2007 की कॉमेडी ‘वेलकम’ से जुड़ा है, जिसमें नाना ने डॉन उदय शेट्टी की भूमिका निभाई थी।
स्रोत-नोट: यह लेख 8 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध रिपोर्टों पर आधारित है। अंतिम संस्कार और पोस्टमार्टम से जुड़ी नई आधिकारिक जानकारी आने पर इसे अपडेट किया जाएगा। पर्दे के पीछे के किस्से नाना पाटेकर और संबंधित फ़िल्मकारों के अपने बयानों पर आधारित हैं।

